Tuesday, January 14, 2014

सितार की आवाज़

आइने का अक्स मुझे कभी पसंद नहीं था
मेरा चेहरा सिर्फ मेरे दीमाग मे था
आईने का चेहरा में खोना चाहता था
हमेशा के लिए ।।

पर कुछ जोड़े हुए था मुझे
कुछ अजीब सा
कुछ अपना सा
जिसे न मैं छु पाता
न देख पाता था
पर वो सुनाई ज़रूर देता था
जीवन के संगीत की तरह
सितार की आवाज़ हो जैसे ।।

एक दिन आईने के सामने खड़े होके
मैंने अपना चेहरा नोचना शुरू किया
कितना वक़्त लगा यह कहना तो मुश्किल है
पर आईने से जब खून साफ़ किया तो
एक अजनबी खड़ा था
और उस दिन से सितार की आवाज़ हमेशा के लिए खामोश हो गयी ।।



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